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मध्यप्रदेश • about 14 hours ago Breaking

फर्जी डॉक्टर का भंडाफोड़: असली डॉक्टर देवास में पदस्थ, दूसरा व्यक्ति 17 साल से सरकारी अस्पताल में कर रहा था मरीजों का इलाज; बीएमओ भी रहा आरोपी

27 October 2026 • 04:02 am

मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में लापरवाही और फर्जीवाड़े का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक व्यक्ति पिछले लगभग 17 वर्षों से किसी अन्य असली डॉक्टर के नाम, शैक्षिक योग्यताओं और मेडिकल रजिस्ट्रेशन नंबर का उपयोग करके सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज करता रहा। सबसे हैरानी की बात यह है कि इस फर्जीवाड़े के दम पर आरोपी ने न केवल लंबी नौकरी की, बल्कि ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (बीएमओ) जैसे महत्वपूर्ण और जिम्मेदार प्रशासनिक पदों पर भी अपनी सेवाएं दीं। स्वास्थ्य विभाग में आंतरिक जांच के बाद अब इस मामले में पुलिस ने आरोपी के खिलाफ गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कर ली है, और उसकी गिरफ्तारी के लिए ताबड़तोड़ दबिश दी जा रही है।

असली डॉक्टर देवास में, और हमनाम बालाघाट में संभाल रहा था कमान

प्रशासनिक और विभागीय दस्तावेजों के अनुसार, इस पूरे फर्जीवाड़े का खुलासा तब हुआ जब स्वास्थ्य विभाग तक इसकी शिकायत पहुँची। जांच में यह तथ्य सामने आया कि दस्तावेजों में दर्ज असली डॉक्टर सुनील कुमार सिंह वर्तमान में चिकित्सा अधिकारी (PGMO) के पद पर देवास जिले में पदस्थ हैं। दूसरी ओर, बालाघाट और दमोह क्षेत्र में 'डॉ. सुनील कुमार सिंह' के नाम से नौकरी करने वाला व्यक्ति असल में रीवा जिले का रहने वाला शिवकुमार पांडे है (जो स्वर्गीय रामलखन पांडे का पुत्र है)।

शिवकुमार पांडे ने असली डॉक्टर के नाम और डिग्री के आधार पर फर्जी दस्तावेज तैयार किए और संविदा तथा नियमित चिकित्सक के रूप में स्वास्थ्य विभाग में नौकरी हासिल कर ली। वह कई वर्षों तक बिरसा और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों में पदस्थ रहा तथा प्रभारी बीएमओ के रूप में भी कार्य करता रहा। इतने लंबे समय तक सरकारी व्यवस्था के भीतर काम करने के बावजूद किसी भी स्तर पर उसकी असली पहचान का उजागर न होना, प्रशासनिक निगरानी और सत्यापन प्रणाली पर भी बड़े सवाल खड़े करता है।

2024 में मिली थी क्लीनचिट, फिर उच्च स्तर पर खुली पोल

इस मामले में विभागीय जांच की कार्यप्रणाली भी संदेह के घेरे में है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 2024 में भी बिरसा में पदस्थ इस डॉक्टर की डिग्री को लेकर शिकायत दर्ज कराई गई थी। उस समय स्थानीय स्तर पर जांच की गई और रीवा मेडिकल कॉलेज से पत्राचार कर रिकॉर्ड मंगाया गया था। उस वक्त मेडिकल कॉलेज के रिकॉर्ड के आधार पर डिग्री को सही मानकर आरोपी को क्लीनचिट दे दी गई थी, जिससे वह लंबे समय तक कानून की पकड़ से दूर बचा रहा।

लेकिन जब यह मामला उच्च स्तर पर और भोपाल के संज्ञान में आया, तो राज्य स्तरीय उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन किया गया। गहन छानबीन और दस्तावेजों के मिलान के बाद यह स्पष्ट हुआ कि नौकरी करने वाला व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि शिवकुमार पांडे है। इसके बाद विभाग के निर्देश पर स्थानीय थाने में आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की सुसंगत धाराओं (जैसे 318(4), 340(2) और 336(3)) के तहत आपराधिक मामला दर्ज कराया गया।

रीवा स्थित घर पहुंची पुलिस, संपत्ति कुर्क करने की तैयारी

मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद से ही आरोपी शिवकुमार पांडे अपने पैतृक और शासकीय ठिकानों से फरार चल रहा है। पुलिस टीम ने तकनीकी साक्ष्यों और मोबाइल लोकेशन के आधार पर रीवा के बड़ागांव और खुटेही स्थित उसके आवास पर दबिश दी। खुटेही स्थित मकान नंबर 12/789 पर जब पुलिस टीम पहुँची, तो वहाँ आरोपी के बेटे और बेटी मिले, जिन्होंने तस्वीर देखकर उसकी पहचान अपने पिता शिवकुमार पांडे के रूप में की।

पुलिस ने अब आरोपी की गिरफ्तारी के लिए इनाम घोषित करने के साथ ही उसकी चल-अचल संपत्ति का पूरा ब्योरा जुटाना शुरू कर दिया है। रीवा की गुढ़ और हुज़ूर तहसीलों को पत्र भेजकर आरोपी की संपत्तियों की जानकारी मांगी गई है, ताकि नियमानुसार जब्ती और कुर्की की कार्रवाई की जा सके। इस सनसनीखेज खुलासे के बाद से स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मचा हुआ है और दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया को लेकर प्रशासनिक हलकों में सुगबुगाहट तेज हो गई है।